माले का आरोप- चुनाव आयोग का बुलेटिन भ्रामक:राज्य सचिव कुणाल बोले- आपत्तियों को खारिज कर दिया गया, प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाया
बिहार में मतदाता सूची से 65 लाख नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया अब गहरे विवाद में घिर गई है। एक तरफ जहां राहुल गांधी और तेजस्वी यादव SIR की खामियों और गड़बड़ियों को लेकर बिहार भर में वोट अधिकार यात्रा निकाल रहे है, वहीं दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग द्वारा हर दिन जारी किए जाने वाली सूचना में राजनीतिक दलों द्वारा एक भी आपत्ति दर्ज नहीं किए जाने पर दलों ने सवाल खड़े किए है। राजनीतिक दलों ने निर्वाचन आयोग पर पारदर्शिता की कमी और विपक्षी दलों की छवि खराब करने का आरोप लगाया है। माले का आरोप आयोग का बुलेटिन भ्रामक, माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि 21 अगस्त को जारी आयोग के बुलेटिन में यह दावा किया गया कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से हटाए गए मतदाताओं के मामले में किसी भी राजनीतिक दल के बीएलए ने आपत्ति दर्ज नहीं की है जबकि यह पूरी तरह गलत है। उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी और बीएलए ने कई स्तरों पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं।आपत्तियों को लगातार यह कहकर खारिज किया गया कि वे निर्धारित प्रोफार्मा में नहीं हैं।आयोग ने आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया को प्रभावी और पारदर्शी नहीं बनाया। प्रमाण सहित दी गई आपत्ति को भी आयोग ने नकारा, कुणाल ने बताया कि 20 अगस्त 2025 को माले के अधिकृत बीएलए विश्वकर्मा पासवान आरा विधानसभा-194, बूथ संख्या-100 ने बाकायदा शपथ पत्र सहित फॉर्म-6 स्थानीय बीएलओ को सौंपा था।यह आपत्ति मिंटू पासवान जिसका एपिक नंबर – RGX0701235 और मुन्ना पासवान जिसका एपिक नंबर – RGX2861375 है उन्होंने अपनी दर्ज कराई थी। उनके पास उसकी रिसीविंग कॉपी भी मौजूद है। इसके बावजूद आयोग ने 21 अगस्त के बुलेटिन में माले के कॉलम में शून्य दर्ज किया गया और बताया गया किसी राजनीतिक दलों ने कोई अपनी दर्ज नहीं कराई है। सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे मतदाता पर आयोग के पास कोई आपत्ति नहीं, निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों द्वारा की भी आपत्ति दर्ज नहीं करने के दावे पर व्यक्ष के सभी दलों ने सख्त आपत्ति दर्ज की है। माले ने कहा कि इस मामले में मिंटू पासवान खुद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे थे। इसके बाद उन्होंने बिहार निर्वाचन कार्यालय में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। वहां उन्हें आश्वासन दिया गया था कि भोजपुर जिले में उनकी आपत्ति स्वीकार कर ली जाएगी लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है। गंभीर अनियमितता और विपक्ष की छवि पर हमला, माले ने इसे गंभीर अनियमितता करार दिया है। कुणाल ने कहा कि आयोग की इस कार्यप्रणाली से विपक्षी दलों की गलत छवि पेश हो रही है, जैसे उन्होंने कोई आपत्ति दर्ज ही नहीं की। उन्होंने निर्वाचन आयोग से सवाल किया कि निर्धारित फॉर्म और शपथ पत्र जमा करने के बावजूद आपत्तियों को शून्य क्यों दिखाया गया? साथ ही यह भी8 कहा कि क्या आयोग राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है? साथ ही यह कहा गया है कि 65 लाख मतदाताओं को सूची से बाहर करने की प्रक्रिया की वास्तविक स्थिति क्या है? 65 लाख नाम पर सियासत घमासान चुनाव आयोग ने हाल ही में बिहार की मतदाता सूची से लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का फैसला लिया था। आयोग का तर्क था कि यह प्रक्रिया एसआईआर अभियान का हिस्सा है।दावा किया गया कि इन नामों में बड़ी संख्या में मृतक, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या फर्जी वोटर शामिल थे।विपक्ष का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाना न केवल अव्यावहारिक है बल्कि इसमें विशेष समुदायों और वर्गों को टारगेट करने की आशंका है। 2025 चुनाव में राजनीतिक असर बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं और मतदाता सूची का विवाद चुनावी माहौल को और गरमा रहा है।विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग की इस कार्रवाई से गरीब, दलित, अल्पसंख्यक और प्रवासी मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।एनडीए खेमे का मानना है कि यह कदम चुनाव को पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी था।लेकिन विपक्ष इस पर लोकतंत्र पर हमला और वोटर चोरी की साजिश जैसे गंभीर आरोप लगा रहा है।
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