बक्सर में जन्माष्टमी पर बांके बिहारी मंदिर में 5000 श्रद्धालु:कृष्ण जन्मोत्सव पर भजन-कीर्तन और आतिशबाजी, 15 KM दूर मन्नत मांगने आते है भक्त

Aug 17, 2025 - 08:30
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बक्सर में जन्माष्टमी पर बांके बिहारी मंदिर में 5000 श्रद्धालु:कृष्ण जन्मोत्सव पर भजन-कीर्तन और आतिशबाजी, 15 KM दूर मन्नत मांगने आते है भक्त
बक्सर के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। मध्यरात्रि में भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव पर मंदिर परिसर भक्तिमय माहौल से सराबोर हो गया। शंखनाद और घंटे-घड़ियाल की ध्वनि के बीच आतिशबाजी की गई। डुमरांव अनुमंडल स्थित इस मंदिर में पांच हजार से अधिक श्रद्धालुओं ने पूरी रात दर्शन किए। मंदिर को रंग-बिरंगी झालरों, फूलों और बिजली की लाइटों से सजाया गया। आधी रात को कृष्ण की आरती के समय "नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की" के जयघोष गूंजे। महिलाओं ने मंगल गीत गाए। बच्चे राधा-कृष्ण के वेश में नृत्य करते दिखे। बक्सर से 15 किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर ऐतिहासिक महत्व रखता है। इसका निर्माण 1825 में डुमरांव के महाराजा बहादुर जयप्रकाश सिंह के आदेश पर हुआ। मंदिर की मान्यता 400 वर्ष से भी पुरानी है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। मंदिर से जुड़ा एक विशेष तथ्य है कि भारत रत्न से सम्मानित शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां और उनके पिता यहां शहनाई बजाया करते थे। उनकी मधुर धुनों से मंदिर का वातावरण संगीतमय हो जाता था। आज भी जन्माष्टमी पर लोग इस परंपरा को याद करते हैं। सुरक्षा के लिए प्रशासन अलर्ट श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। मंदिर परिसर और आसपास पुलिस बल की तैनाती की गई थी। खुद एसडीओ कुमार राकेश कुमार और एसडीपीओ मौके पर मौजूद रहकर विधि-व्यवस्था की मॉनिटरिंग करते दिखे। जगह-जगह बैरिकेडिंग की गई और शहर के मुख्य चौक-चौराहों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया। प्रशासन की इस तत्परता से श्रद्धालु बिना किसी बाधा के अपनी आस्था में लीन दिखे। पूरे जिले में उत्सव का माहौल बांके बिहारी मंदिर के अलावा जिले के छोटे-बड़े सभी मंदिरों में देर रात तक भजन-कीर्तन चलता रहा। घर-घर में भी श्रद्धालुओं ने लड्डू गोपाल को आकर्षक रूप से सजाया और पूरे दिन व्रत रखकर सुख-समृद्धि की कामना की। महिलाएं मंगल गीत गाते हुए भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट कर रही थीं। वहीं, बच्चों को राधा और कृष्ण के परिधानों में सजाकर माता-पिता ने पर्व को और भी रंगीन बना दिया। जन्माष्टमी का यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी लोगों को जोड़ने वाला है।

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