खुदीराम बोस की 117वीं शहादत दिवस पर जेल में कार्यक्रम:मुजफ्फरपुर में जेल परिसर को रंगीन बल्बों-रोशनी से सजाया, पश्चिम बंगाल से पहुंचे शहीद के परिजन

Aug 11, 2025 - 12:30
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खुदीराम बोस की 117वीं शहादत दिवस पर जेल में कार्यक्रम:मुजफ्फरपुर में जेल परिसर को रंगीन बल्बों-रोशनी से सजाया, पश्चिम बंगाल से पहुंचे शहीद के परिजन
देश के सबसे युवा क्रांतिकारी अमर शहीद खुदीराम बोस की आज 117वां शहादत दिवस है। इस अवसर पर मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा में भावपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जेल परिसर को रंगीन बल्बों और रोशनी से सजाया गया। फांसी स्थल पर जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सुशील कुमार, जेल अधीक्षक युसुफ रिजवान, अन्य जेल अधिकारी, गणमान्य नागरिक व उपस्थित लोगों ने माल्यार्पण किया।उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से शहीद के परिजन भी मौजूद रहे। बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में लिया था हिस्सा 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर में जन्मे खुदीराम बोस ने किशोरावस्था में ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू की। साल 1905 में बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अंग्रेजी हुकूमत को सबक सिखाने के लिए 30 अप्रैल 1908 को उन्होंने अपने साथी प्रफुल्ल चंद्र चाकी के साथ मिल कर सेशन जज किंग्सफोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका। दुर्भाग्यवश, उस समय गाड़ी में किंग्सफोर्ड की जगह दो यूरोपीय महिलाएं सवार थीं, जिनकी मौत हो गई। इस घटना के बाद अंग्रेजों की पुलिस ने दोनों का पीछा किया। गिरफ्तारी से बचने के लिए प्रफुल्ल चंद्र चाकी ने आत्महत्या कर ली, जबकि खुदीराम बोस पकड़े गए। मुकदमे के बाद 11 अगस्त 1908 को उन्हें मात्र 19 साल की आयु में मुजफ्फरपुर केंद्रीय कारा में फांसी दी गई। फांसी के समय उनके हाथ में भगवद गीता थी और चेहरे पर मुस्कान भी थी। जो आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर है।

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