बिहार में इजराइली तकनीक से खेती कर रहे युवा किसान:खेत में मेढ़ बनाकर पौधों की जड़ों तक पहुंचा रहे पानी, खाद; 1 एकड़ खेत में 40 हजार की लागत
बिहार की राजधानी पटना के एक युवा किसान इजरायली तकनीक से पिछले दो साल से खेती कर अच्छा मुनाफा हासिल कर रहे हैं। वे इस तकनीक से सीधे पौधों की जड़ तक पहुंचा रहे पानी और उर्वरक पहुंचा रहे हैं, जिससे पैदावार बेहतर हो रही है। इस तकनीक में प्लास्टिक की पाइप का यूज होता है। युवा किसान बताते हैं कि एक एकड़ की खेत में इस तकनीक को लगाने में करीब 36 से 40 हजार रुपए की लागत आती है। बिहार के प्रगतिशील किसान में आज बात पटना जिले के बिक्रम प्रखंड के अराप गांव के रहने वाले आकाश कुमार की। आकाश पहले पोल्ट्री फॉर्म के कारोबार से जुड़े थे। लेकिन आकाश को खेती की इजरायली तकनीक इतनी पसंद आई कि उन्होंने इस तकनीक के जरिए खेती करने का मन बना लिया। अब जानिए क्या है इजरायली तकनीक आकाश इजरायली तकनीक की मदद से सब्जी की खेती कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इजरायली तकनीक से मेढ़ आधारित खेती होती है। तीन-तीन फीट के मेढ़ बनाए जाते हैं। इन मेढ़ों में 16 एमएम की पाइप इंसर्ट की जाती है। इसी पाइप से सिंचाई के लिए पानी पौधों तक पहुंचता है। क्या है इजरायली तकनीक की खासियत खेती के लिए यूज की जा रही इजरायली तकनीक की खासियत ये है कि इसी पाइप से फर्टिलाइजर भी पौधों तक पहुंच जाता है। फर्टिलाइजर पानी के साथ ही लिक्विड फॉर्म में जाता है। पाइप में हर 16 से 18 इंच पर एक छेद होता है, जिससे फर्टिलाइजर मिला हुआ पानी पौधों की जड़ तक सीधे जाता है। मैन पावर की जरूरत कम हो जाती है, क्योंकि उर्वरक व पानी सीधे पौधों तक पहुंचता है। इजरायली तकनीक यूज करने का फायदा इजरायली तकनीक यूज किए जाने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि पानी और फर्टिलाइजर की बर्बादी नहीं होती। ये सीधे पौधे की जड़ तक यह पहुंचता है। अब इस तकनीक के दूसरे फायदे पर आते हैं। इसमें पूरे खेत की मल्चिंग की जाती है। मल्चिंग यानी मिट्टी को 25 माइक्रोन की प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है। ये मिट्टी में खरपतवारों को बढ़ने से रोकता है और साथ ही साथ मिट्टी की नमी को बरकरार रखता है। मेढ़ों के बीच में वेसल डोज बनाकर डाला जाता है जिस पर पौधे उगाए जाते हैं। इस वेसल डोज में गाय का गोबर, पोटाश, डीएपी व माइक्रोन्यूट्रिएंट्स मिली हुई मिट्टी होती है। इसी में अंतराल पर पौधे उगाए जाते हैं। प्रति फसल औसत लागत 20 से 22 हजार प्रति एकड़ आकाश बताते हैं- मैं पिछले दो साल से ढाई एकड़ में इस तकनीक का यूज कर खेती कर रहा हूं। खासतौर पर टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च और बीन्स की पैदावार करता हूं। इस तकनीक को एक एकड़ में लगाने में लागत करीब 36 से 40 हजार आती है। फर्टिलाइजर और सिंचाई की लागत 25 हजार तक आती है। एक बार इस तकनीक में इन्वेस्ट करने पर अधिकतम तीन बार फसल लिया जा सकता है। इस लिहाज से प्रति फसल औसत लागत 20 से 22 हजार प्रति एकड़ आती है। मेरे एक मित्र और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब से इस तकनीक के बारे में सुना और देखा था। प्रतिकूल मौसम से प्रभावित नहीं होती फसल आकाश का कहना है कि इस तकनीक से खेती में लागत के मुताबिक न्यूनतम 25 फीसदी शुद्ध मुनाफा होना ही होना है। खेती अच्छी रही तो मुनाफे का प्रतिशत बढ़ जाता है। साथ ही इस तरह की खेती मौसम के प्रतिकूल स्थिति से प्रभावित नहीं होती। वे बताते हैं कि आमतौर पर खेती में अनिश्चितता की वजह से किसान इससे विमुख होते जा रहे हैं, पर मैं जिस तकनीक का यूज कर रहा हूं, वो इस अनिश्चितता का तोड़ है। इसमें खेती खराब होने की आशंका नहीं के बराबर रहती है। इसके पैदावार को मार्केट में हाथों-हाथ लिया जाता है। इन प्रगतिशील किसान से और जानें 8083961930 यह खबर दूसरों से भी शेयर करें आप भी किसान हैं और कोई अनोखा नवाचार किया है तो पूरी जानकारी, फोटो-वीडियो अपने नाम-पते के साथ हमें 8770590566 पर वॉट्सऐप करें। ध्यान रहे, आपका किया काम किसी भी मीडिया या सोशल मीडिया में जारी न हुआ हो।
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