स्वतंत्रता सेनानी की विधवा को नहीं मिल रही पेंशन:अररिया की मालती देवी 7 साल से कर रहीं इंतजार, पति को मिला था राष्ट्रपति सम्मान
अररिया के स्वतंत्रता सेनानी स्व. कलानंद सिंह की विधवा मालती देवी को सात वर्षों से स्वतंत्रता सेनानी पेंशन का इंतजार है। कलानंद सिंह का जन्म 1918 में अररिया जिले के नरपतगंज प्रखंड के कुंडीलपुर गांव में हुआ था।उन्होंने 1931 और 1942 के स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष के दौरान उन्हें भागलपुर सेंट्रल जेल में कई वर्ष बिताने पड़े। उनकी देशभक्ति और योगदान को देखते हुए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया।मालती देवी ने भी स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करती थीं। साथ ही युवाओं को आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित भी करती थीं। पति के निधन के बाद से मालती देवी पेंशन के लिए संघर्ष कर रही हैं। उनका कहना है कि देश की आजादी के लिए किए गए संघर्ष के बाद आज उन्हें पेंशन के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। स्वतंत्रता सेनानी की विधवा की यह कहानी आजाद भारत में स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों की उपेक्षा को दर्शाती है। पिछले साल BDO ने दिया था आश्वासन पिछले साल 15 अगस्त को रानीगंज के तत्कालीन बीडीओ रीतम कुमार ने मालती देवी के घर जाकर उन्हें शॉल भेंटकर सम्मानित किया था और पेंशन शुरू करने का आश्वासन दिया था। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस है। मालती देवी और उनका परिवार आज फटेहाल स्थिति में जीवन यापन करने को मजबूर है। वह कहती हैं, "सात साल में न कोई अधिकारी, न कोई प्रतिनिधि हमारा हाल जानने आया। 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भी हमें कोई नहीं पूछता। पेंशन शुरू करने के लिए होगी कार्रवाई इस मामले में अररिया के एसडीएम रवि प्रकाश ने आश्वासन दिया है कि पेंशन शुरू करने के लिए जल्द कार्रवाई की जाएगी। लेकिन मालती देवी का सवाल आज भी अनुत्तरित है, "हमने देश के लिए सबकुछ दिया, लेकिन आज हमें सम्मान और सहायता के लिए क्यों तरसना पड़ रहा है?" यह कहानी केवल मालती देवी की नहीं, बल्कि उन तमाम स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों की है, जो आज भी उपेक्षा का शिकार हैं। इस स्वतंत्रता दिवस पर, हमें न केवल अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना चाहिए, बल्कि उनके परिवारों को वह सम्मान और सहायता प्रदान करने का संकल्प लेना चाहिए, जो उनका हक है।
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