29 साल बाद CBI कोर्ट ने 2 को दी सजा:जाली NSC गिरवी रख शातिरों ने बैंक से निकाले थे 2.60 लाख, जुर्माना भी लगा

Aug 28, 2025 - 20:30
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29 साल बाद CBI कोर्ट ने 2 को दी सजा:जाली NSC गिरवी रख शातिरों ने बैंक से निकाले थे 2.60 लाख, जुर्माना भी लगा
बैंक के साथ धोखाधड़ी के एक 29 साल पुराने केस में गुरुवार को पटना में CBI कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। बैंक के साथ धोखाधड़ी करने वाले राणा अशोक कुमार सिंह उर्फ दीना सिंह और अनिल कुमार श्रीवास्तव को जुर्माना लगाने के साथ ही जेल की सजा मिली है। कोर्ट ने राणा अशोक कुमार सिंह के ऊपर 7 लाख रुपया का जुर्माना लगाने के साथ ही 3 साल के जेल की सजा सुनाई है। इसी तरह अनिल कुमार श्रीवास्तव 17, 500 रुपए का जुर्माना लगाने के साथ ही एक साल 5 महीने जेल की सजा दी गई है। बैंक के साथ धोखाधड़ी करने का यह मामला साल 1991 का है। लेकिन, CBI ने केस साल 1996 में दर्ज किया था। बैंक मैनेजर ने पकड़ी थी जालसाजी इलाहाबाद बैंक के एग्जीबिशन रोड ब्रांच से 1991 में अशोक कुमार सिंह ने 3 लाख 59 हजार रुपए का राष्ट्रीय बचत पत्र (NSC) गिरवी रख 2 लाख 60 हजार रुपए का लोन लिया था। बाद में बैंक मनैजर को इस मामले में फर्जीवाड़े का पता चला। तब 6 फरवरी 1996 को मैनेजर के कंप्लेन पर CBI ने केस दर्ज किया था। इसके बाद केस की जांच शुरू हुई। पड़ताल में चौंकाने वाली बातें उस दौरान सामने आई थी। राणा अशोक कुमार सिंह ने कुछ लोगों के साथ मिलकर जाली राष्ट्रीय बचत पत्र एक प्रिंटिंग प्रेस में तैयार करवाए थे। उसके बाद इलाहाबाद बैंक के एक बैंक स्टाफ और दूसरे व्यक्ति शशि भूषण पांडे की मिलीभगत से रुपए बैंक से ले लिए। घर से मिली थी मशीन CBI की जांच जब इस केस में आगे बढ़ी तो पता चला कि मशीन मुख्य अभियुक्त का ही है। राणा अशोक के घर पर छापेमारी की गई थी और वहीं से एक प्रिंटिंग मशीन भी बरामद हुई थी। इसी मशीन से जाली राष्ट्रीय बचत पत्र पर नंबर्स प्रिंट किए गए थे। इस मामले में CBI ने 30 अप्रैल 1998 को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी। इसमें कुल 5 लोगों को आरोपी बनाया गया था। राणा अशोक कुमार सिंह उर्फ दीना सिंह, अनिल कुमार श्रीवास्तव, गंगा सागर, इलाहाबाद बैंक के एग्जीबिशन रोड ब्रांच के पूर्व मैनेजर शशिभूषण पांडेय और बैंक के एक अधिकारी बिंदेश्वरी सिंह का नाम इसमें शामिल था। हालांकि, दो अभियुक्तों, गंगा सागर और बिंदेश्वरी सिंह को कोर्ट ने बाद में बरी कर दिया था। क्योंकि, इस आपराधिक षडयंत्र में शामिल होने के ठोस सबूत नहीं मिले थे। जबकि, शशि भूषण पांडे की पहले ही मौत हो चुकी है।

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