बिहार की IPS काम्या मिश्रा के इस्तीफे की हकीकत:बोलीं- असल में वर्दी कभी उतारी नहीं जाती, बस अपना रूप बदल लेती है; जानिए, अब क्या करेंगी

Feb 3, 2026 - 07:30
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बिहार की IPS काम्या मिश्रा के इस्तीफे की हकीकत:बोलीं- असल में वर्दी कभी उतारी नहीं जाती, बस अपना रूप बदल लेती है; जानिए, अब क्या करेंगी
5 अगस्त 2024.., तत्कालीन दरभंगा ग्रामीण एसपी काम्या मिश्रा के इस्तीफे की खबर आई। तब किसी को यकीन नहीं हुआ था कि 28 साल की एक लड़की ने 2019 में पहले अटेंप्ट में UPSC पास किया। IPS बनी। लेडी सिंघम के रूप में मशहूर जिस अधिकारी से अपराधी खौफ खाते थे। अचानक उसने इस्तीफा क्यों दे दिया… रिजाइन लेटर में बस इतना लिखा था, पारिवारिक और निजी कारण। इसके बाद काम्या मिश्रा ने इस पर कभी कहीं बात नहीं की। 7 महीने बाद 27 मार्च 2025 को उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। अब इस्तीफे के 18 महीने बाद काम्या मिश्रा ने एक टॉक शो में इस्तीफे की वजह बताई, बिहार में बतौर IPS अनुभव और आगे की योजना पर खुलकर बात की है। उन्होंने कहा, ‘वर्दी असल में कभी उतारी नहीं जाती, बस अपना रूप बदल लेती है।’ अब काम्या की जुबानी ही पढ़िए, उन्होंने नौकरी क्यों छोड़ी? आगे क्या कर रही हैं? बिहार से क्या सीखा? बिहार ने मुझे कभी एहसास नहीं होने दिया कि महिला अधिकारी हूं TEDxGIMS के टॉक शो में शामिल काम्या मिश्रा बताती हैं, 'मैं आपको एक छोटी सी लड़की की कहानी सुनाने जा रही हूं, ओडिशा में एक जगह है रायरंगपुर। इतना छोटा शहर कि गूगल मैप भी उसे खोजने में मुश्किल महसूस करे। उस जगह ने भारत को एक राष्ट्रपति (श्रीमती द्रौपदी मुर्मू) दी। मुझे एक ऐसा सपना दिया, जिसे मैं अंत में छोड़ भी आई। 23 साल की उम्र में ASP बनने वाली देश की पहली लड़की बनी। बिहार में 6 साल तक IPS की नौकरी की। इस दौरान बिहार ने मुझे सबकुछ दिया। मैंने बिहार को जाना, समझा और जिया…बिहार पहले ज्ञान की धरती है। बुद्ध से लेकर महावीर तक, यह आगमन की भूमि है। बिहार को लेकर मेरी सोच कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। वह मेरे खाकी वर्दी में बिताए गए छह साल हैं। इस राज्य ने एक बार भी मुझे यह महसूस नहीं कराया कि मैं कोई कमतर अधिकारी हूं, क्योंकि मैं औरत हूं। यह मेरे सीनियर अधिकारियों के व्यवहार में झलकता था, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि मैं अपने किसी भी पुरुष सहयोगी की तरह ही छापे में शामिल होऊं और ऑपरेशन संचालित करूं। यहां तक कि मेरी पोस्टिंग भी इसी तरह तय होती थी। मेरा प्रोफेशनल करियर वैशाली के लालगंज से शुरू हुआ। एसएचओ के रूप में। फिर पटना में एएसपी सदर और सचिवालय एसपी बनी। फिर दरभंगा रूरल की एसपी बनी। अब, इन सभी घटनाओं और बिहार की मेरी यादों ने मुझे कुछ बहुत सुंदर चीजें समझने में मदद की है।' बिहार में भावनाएं बहती हैं, दो उदाहरण से समझिए केस-1 काम्या कहती हैं,'मैंने पहली गिरफ्तारी छठ पर्व के मौके पर की थी। तब मुझे छठ के सांस्कृतिक महत्व का पूरा एहसास नहीं था। मैं इस महापर्व के बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। मेरे साथी पदाधिकारी ने मुझसे बार-बार अनुरोध किया कि गिरफ्तारी को थोड़ा टाल दिया जाए, लेकिन मैंने उनकी सलाह पर ध्यान नहीं दिया। मैं आरोपी को गिरफ्तार करने चली गई। आरोपी की मां लगातार रोते हुए मुझसे बेटे को छोड़ने की गुहार लगाती रही, लेकिन मैंने वही किया जो जरूरी था। आरोपी को गिरफ्तार तो कर लिया, लेकिन लौटकर थाना जाते वक्त उसके रोने की आवाज मेरे कानों में गूंजती रही। मैं बहुत बुरा महसूस कर रही थी। तीन दिन बाद, वही महिला मेरे पास एक थैली में ठेकुआ लेकर आई, जो तीन दिन के लंबे उपवास के बाद बनाया गया प्रसाद था। उसने मेरे साथ उस अधिकारी को भी प्रसाद दिया, जिसने उसके बेटे को गिरफ्तार किया था। कहा, बेटा, अब शायद मेरा बेटा रास्ते पर आ जाए, आपने सही किया।' बिहार ने मुझे सिखाया कि सामान्य लोग असामान्य काम करने में कितने सक्षम होते हैं।' केस-2 काम्या ने आगे कहा, '8 साल की एक लड़की मेरी बाहों में थी। उसके गालों और शरीर पर काटने के निशान थे। उसके साथ बुरी तरह से बलात्कार हुआ था। जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो दो आदमी छत से चिल्लाते हुए कहते हैं, ‘मैम, इन बच्चों ने गलती कर दी होगी, उन्हें छोड़ दो। इन्हें छोड़ दो? छोड़ दो? उस दिन मैं भीतर से टूट गई, मेरे भीतर से आवाज आई। मैं आरोपी को गिरफ्तार कर सकती थी, लेकिन उस मानसिकता को नहीं, जिसने उसे जन्म दिया था। इस तरह बिहार और मेरी बहुत कड़वी-मीठी यादें बन गई हैं।' पुलिस की नौकरी में हर दिन कठिन फैसले लेने होते हैं काम्या कहती हैं, 'जब मेरी पोस्टिंग पटना हुई थी। हम नए-नए पटना में आए थे। मेरे एक इंस्पेक्टर (जो 30 साल से सेवा में थे) एक बार मुझसे बोले- यह राजधानी है, यह आपको हिला देगी, लेकिन आपको डिगे रहना है। पुलिस की नौकरी इतनी आसान भी नहीं है। जब आप अपने घरों में होली और दिवाली को शांति से सेलिब्रेट करते हैं तो एक पुलिसकर्मी किसी जगह सांप्रदायिक दंगे के डर की चिंता में डूबा रहता है। कभी विरोध-प्रदर्शन के बारे में सोचिए? किसी और की समस्या। किसी और की लड़ाई, लेकिन पुलिस उसमें सीधे पक्ष बनकर खड़ी हो जाती है। जानते हैं सबसे बुरी बात क्या होती है? अपने साथ खड़े सहयोगियों को घायल होते, अपनी आंखों के सामने मरते देखना।' पुलिस अधिकारी के हिस्से सीनियर या परिवार की नाराजगी आती है काम्या टॉक शो में सवाल भी करती हैं, 'जानते हैं विडंबना क्या है? हमारे हिस्से में कोई धन्यवाद नहीं होता। हमारे हिस्से एक नाराज सीनियर अधिकारी होते हैं, क्योंकि केस डायरी में कोई गलती हो गई है। या घर पर चिल्लाते लोग। क्योंकि हम परिवार के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता रहे। या फिर नाराज जनता, क्योंकि उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। ये ऐसा है, जैसे हर दिन समाज के गंदे पानी को साफ किया जाए। हालांकि, यहां का गंदा पानी इंसानी दुख है। वह कभी रुकता नहीं। आप एक क्राइम थ्रिलर देखते हैं और एक सप्ताह परेशान रहते हैं। ये एक पुलिस अधिकारी की जिंदगी के हर दिन का हिस्सा है। सोचिए कि उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर इसका कितना बुरा असर पड़ता है। अगली बार जब आप किसी पुलिस अधिकारी को देखें, तो मैं चाहूंगी कि आप उन्हें सम्मान की नजरों से देखें।’ कुछ सिस्टम में बड़े होते हैं, कुछ सिस्टम से परे विकसित होते हैं रिजाइन करने के बारे में बात करते हुए काम्या कहती हैं, 'यह त्यागने के बारे में नहीं है। यह नया कुछ करने के लिए जगह बनाने के बारे में है। सफलता का कोई स्वरूप नहीं है। सफलता एक प्रक्रिया है। सरकार ने मुझे बहुत सुंदर तरीके से प्रशिक्षित किया। अब मैं वर्दी की सीमाओं के परे उसके प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश कर रही हूं। कभी-कभी चले जाना त्यागना नहीं होता। यह बड़ा होना होता है। कुछ लोग सिस्टम के भीतर विकसित होते हैं। कुछ उसके परे विकसित होते हैं। आप जानते हैं। आप हर दिन उस नजर से जीवन को रंगना चुनते हैं, जिस नजर से आप चाहते हैं। कभी-कभी जब कैनवास आपकी दुनिया नहीं बना पा रहा तो आप क्या करते हैं? आप रेखाओं के बीच चित्र बनाते रह सकते हैं। या पूरे कैनवास को ही बदल सकते हैं। ताकत कुछ ऐसी नहीं है, जिसे आप पकड़े रखें। ताकत कुछ ऐसी है, जिसे आप बनाएं। एक बैच आपको अधिकार दे सकता है, लेकिन वास्तविक आजादी जीविका बनाने से आती है।’ बिहार ने मुझे समाज को देखने का नया नजरिया दिया वो कहती हैं, 'बिहार ने मुझे समाज को देखने का नया नजरिया दिया। इसी ने मुझे अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया। सिविल सेवाओं को छोड़ने का। फिर भी मैंने सेवा करना चुना। बस अलग तरीके से। शिक्षा के जरिए। लोगों को अवसर देकर और उन्हें कार्य करने का मौका देकर। क्योंकि मुझे लगता है कि हर अपराधी जिसकी मैंने पूछताछ की, मैं खुद हो सकती थी। बस मेरी शिक्षा और माता-पिता के चलते मेरे लिए सपने देखना संभव हुआ। आखिर में उन दोस्तों के लिए जो डरते हैं कि काम कैसे छोड़ें। कभी-कभी जो काम कर रहा है, वह असल में काम नहीं कर रहा होता। उन सहपाठियों के लिए जो सेवा में बने रहे हैं। आप इस सिस्टम की रीढ़ हैं। मैं बस उस ढांचे को थोड़ा और आगे बढ़ा रही हूं। वास्तविक ताकत क्या है? इस बात को समझने में है कि कब छोड़ना है और अगला क्या बनाना है।'

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