NEET छात्रा रेप-मौत, हॉस्टल के CCTV की क्या है सच्चाई:क्या किसी ने बाहर से दरवाजा बंद किया, पुलिस थ्योरी में 2 बजे हॉस्पिटल गई छात्रा
शंभू गर्ल्स हॉस्टल के 10 मिनट 54 सेकेंड के CCTV फुटेज ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही सीसीटीवी ये दिखाते हैं कि छात्रा को कैसे बाहर निकाला गया, लेकिन 6 जनवरी को 3:50 से 4:01 बजे तक के बीच कैमरे में जो दर्ज हुआ, वह पुलिस और SIT की टाइमलाइन से कई जगह टकराता है। पुलिस की पहली थ्योरी के अनुसार छात्रा को 2 बजे हॉस्पिटल ले जाया गया था, जबकि छात्रा 4 बजे तक तो हॉस्टल में ही थी। इसके साथ ही पुलिस ने कहा, छात्रा को दरवाजा तोड़कर निकाला, जबकि सीसीटीवी में दिख रहा है कि दरवाजा ऊपर से हाथ डालकर खोला गया। भास्कर ने एक्सपर्ट से ये समझा कि पुलिस की किन-किन थ्योरी पर ये सीसीटीवी सवाल खड़े करता है और कहां-कहां खामियां दिखाई दे रही हैं? पढ़िए रिपोर्ट… 4 तस्वीरों से समझें छात्रा को कैसे बाहर निकाला गया था… CCTV और पुलिस की टाइमलाइन में 2 घंटे का अंतर लीगल एक्सपर्ट के अनुसार, CCTV फुटेज में साफ दिखता है कि दोपहर 3:50 बजे छात्रा के केबिन के बाहर हलचल शुरू होती है। 3 बजे के 58 मिनट 55 सेकेंड पर गेट खुलता है और 4 बज के एक मिनट और 30 सेकेंड पर छात्रा को गोद में उठाकर बाहर ले जाया जाता है। इसके बावजूद पुलिस के शुरुआती बयानों में छात्रा को 2 बजे अस्पताल लाने जैसी बातें सामने आईं। यह अंतर सिर्फ मिनटों का नहीं, बल्कि पूरे 2 घंटे का है। ये 2 घंटे पूरी मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले हैं। अगर छात्रा 4 बजे तक हॉस्टल में थी, तो 2 बजे अस्पताल पहुंचने का दावा कैसे सही हो सकता है? क्या यह बयान जल्दबाजी में दिया गया या बाद में कहानी बदली गई? यहां फैक्ट सबसे ज्यादा उलझा हुआ दिखाई देता है। सवाल यह भी है कि जब CCTV उपलब्ध था, तो पुलिस ने शुरुआत से उसी के आधार पर आधिकारिक टाइमलाइन क्यों नहीं जारी की। दरवाजा टूटा नहीं ऊपर से खोला गया, कोई और बंद करके तो नहीं गया पुलिस जांच में कहा गया कि केबिन का दरवाजा तोड़ा गया था, लेकिन CCTV में दिखता है कि एक लड़की टेबल पर चढ़कर ऊपर से हाथ डालती है और कुंडी खोलती है। यह सीन ‘दरवाजा तोड़ने’ के दावे से मेल नहीं खाता। इसका मतलब है कि ये दरवाजे ऊपर से खोले और बंद किए जा सकते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि हॉस्टल में घटना के वक्त उस कमरे में कोई और गया हो और उसे पता हो कि दरवाजा ऊपर से बंद किया जा सकता है। 5 जनवरी की रात साढ़े 9 बजे के बाद से 6 जनवरी की शाम 4 बजे के बीच कोई अंदर गया हो। इसके अभी तक कोई पुख्ता सुबूत नहीं मिले हैं। फॉरेंसिक जांच के एंगल से भी यह बड़ा सवाल है। अगर कुंडी ऊपर से खुली, तो क्या दरवाजा अंदर से बंद था या बाहर से? इन सवालों के जवाब के लिए लॉक मैकेनिज्म, कुंडी की ऊंचाई और हैंडल की स्थिति की फॉरेंसिक जांच जरूरी थी, लेकिन जांच में ऐसी किसी फोरेंसिक रिपोर्ट का जिक्र सामने नहीं आया। बेहोशी की हालत में मिली छात्रा, पुलिस को तुरंत कॉल क्यों नहीं किया? CCTV में छात्रा को बेहोशी की हालत में गोद में उठाकर ले जाया जाता दिखता है। ऐसी स्थिति में किसी भी हॉस्टल का प्रोटोकॉल होता है कि सबसे पहले पुलिस-एम्बुलेंस को सूचना दें, लेकिन यहां ऐसा नहीं दिख रहा। सवाल उठता है कि किसने फैसला लिया कि पहले निजी स्तर पर कदम उठाए जाएं? सीधे अस्पताल लेकर चलते हैं, क्या किसी ने पुलिस को कॉल करने से रोका? अगर छात्रा की हालत गंभीर थी, तो एक कॉल पूरी जांच की दिशा बदल सकता था। देरी ने न सिर्फ मेडिकल रिस्पॉन्स को प्रभावित किया, बल्कि क्राइम सीन पर भी सवाल खड़े हो गए। क्राइम सीन बना हॉस्टल, फिर भी सील क्यों नहीं? दरवाजा खुलते ही कई छात्राएं अंदर-बाहर आती-जाती दिखाई दे रही हैं। रोना-धोना, पानी लाना, कंबल निकालना सब कुछ चलता रहा। थोड़ी देर में ही हॉस्टल खाली हो गया, लेकिन पुलिस ने 3 दिन तक हॉस्टल के कमरे को क्राइम सीन मानकर सील तक नहीं किया। सही प्रक्रिया में एरिया को तुरंत बंद किया जाता है, एंट्री-लॉग बनाया जाता है और साक्ष्य सुरक्षित किए जाते हैं। यहां ऐसा कुछ होता नहीं दिखा। सवाल यह है कि क्या पुलिस को देर से सूचना मिली या सूचना मिलने के बाद भी कार्रवाई में ढिलाई बरती गई? CCTV में दिख रहे लड़के ने कैसे कहा कि सो रही है ? फुटेज में कई किरदार दिखते हैं। सबसे पहले आई लड़कियां, बाद में आईं महिलाएं और फिर एक पुरुष। कोई निर्देश देता दिखता है, कोई चुप रहता है, लेकिन जांच में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि निर्णय किसने लिया। किसने दरवाजा खोलने का फैसला किया? किसने छात्रा को बाहर ले जाने का आदेश दिया? किरदारों की भूमिका तय किए बिना जिम्मेदारी तय करना मुश्किल है। वह लड़का कौन है, जो छात्रा को लेकर भागा। पहले उसने किस आधार पर कहा कि लड़की सो रही होगी। पूरा CCTV क्यों नहीं सामने लाया गया ? अब तक वही CCTV सामने आया है, जो 3:50 के बाद का है। इससे पहले क्या हुआ, यह सार्वजनिक नहीं किया गया। सवाल है कि पूरा फुटेज क्यों नहीं दिखाया जा रहा है? क्या इससे पहले की घटनाएं जांच को किसी और दिशा में ले जातीं? जब मामला इतना संवेदनशील है, तो पारदर्शिता ही विश्वास पैदा कर सकती है। सेलेक्टेड फुटेज दिखाने से यह आशंका पैदा होती है कि कहीं सच का कोई हिस्सा छूट तो नहीं गया। कम से कम मां-बाप को तो पूरा सीसीटीवी दिखाना चाहिए। जब छात्रा कमरे में जाती है, उसके बाद से एक-एक मिनट का सीसीटीवी क्या कहता है?
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