नालंदा में आस्था का अनोखा रंग:जहां बलि नहीं, खीर के प्रसाद से खुश होते हैं लालचन बाबा;100 साल से जारी है परंपरा

Feb 2, 2026 - 08:30
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नालंदा में आस्था का अनोखा रंग:जहां बलि नहीं, खीर के प्रसाद से खुश होते हैं लालचन बाबा;100 साल से जारी है परंपरा
नालंदा जिले में एक छोटे से गांव बहुआरा में आस्था की एक अनोखी परंपरा सदियों से कायम है। यहां का 'बाबा लालचन स्थान' न केवल धार्मिक मान्यताओं का केंद्र है, बल्कि सामाजिक सुधार और मानवीय मूल्यों का भी प्रतीक बन गया है। स्वप्न से हुई थी शुरुआत बिहारशरीफ जिला मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर शेरपुर-दुर्गापुर मार्ग पर बसे बहुआरा गांव की यह कहानी करीब एक सदी पुरानी है। मंदिर समिति के अध्यक्ष गिरानी यादव बताते हैं कि लगभग 100 वर्ष पहले जब जीराइन नदी में विनाशकारी बाढ़ आई थी, उस दौरान गांव के अनेक लोगों को एक साथ समान स्वप्न दिखाई दिया। स्वप्न में एक विक्षिप्त शव ने ग्रामीणों से गुहार लगाई कि उसे बचाया जाए और स्थान दिया जाए। अगली सुबह जब ग्रामीण नदी किनारे पहुंचे तो कोई शव नहीं मिला। तभी आकाशवाणी हुई, 'मिट्टी उठाकर नदी में डाल दो और पिंड बना दो।' ग्रामीणों ने दैवीय आदेश का पालन किया और वहीं पिंड स्थापित किया, जो आज बाबा लालचन के रूप में पूजा जाता है। बलि की जगह खीर का प्रसाद इस धार्मिक स्थल की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यहां की बदली हुई परंपरा है। स्थानीय निवासी उमेश यादव बताते हैं कि निकटवर्ती गौरैया स्थान पर पहले पशु बलि दी जाती थी, लेकिन बाबा लालचन की कृपा और प्रभाव से अब यह प्रथा पूर्णता समाप्त हो चुकी है। अब मन्नत पूरी होने पर श्रद्धालु जानवरों के दूध से वहीं पर खीर यानी तस्माई बनाते हैं और बाबा को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह बदलाव केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी परिचायक है। रहस्यमयी कुआं: जो कभी नहीं सूखता मंदिर के पीछे नदी के बीच स्थित एक कुआं श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का विषय है। ग्रामीणों का दावा है कि दशकों से इस कुएं का जल कभी नहीं सूखा, भले ही नदी पूरी तरह सूख जाए। इसी जल से बाबा का प्रसाद तैयार किया जाता है और भक्तगण इसमें स्नान कर खुद को शुद्ध करते हैं। गाय-भैंस के बच्चा देने के 20 दिन उसके दूध से खीर बनती और प्रसाद के रूप में चढ़ता है। उसके बाद ही पशुपालक दूध बेचने का काम करते हैं। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास राजगीर निवासी सरिता देवी पिछले चार वर्षों से नियमित रूप से यहां आती हैं। उनका कहना है कि यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। ग्रामीण चुन्नू यादव के अनुसार, साल भर यहां भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। मनोकामना पूर्ण होने पर परिवार सहित आकर लोग बाबा को खीर चढ़ाते हैं। यहां मुंडन संस्कार और विवाह जैसे शुभ कार्य भी संपन्न होते हैं। माघ मेले की धूम, विकास की प्रतीक्षा वर्तमान में यहां माघ शुक्ल पक्ष का 15 दिवसीय मेला चल रहा है, जिसमें दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। हालांकि, जिला मुख्यालय के निकट होने और व्यापक ख्याति के बावजूद, यह स्थल अभी भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। लोगों ने प्रशासन से इस तीर्थ स्थल के समुचित विकास और सौंदर्यीकरण की मांग की है। उनका मानना है कि उचित विकास से यह स्थान न केवल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है, बल्कि क्षेत्र के आर्थिक विकास में भी योगदान दे सकता है। बाबा लालचन स्थान सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य स्थापित करने का एक जीवंत उदाहरण है, जहां आस्था के साथ-साथ मानवीय संवेदना भी सर्वोपरि है।

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