बेटे और पति की राह देखते-देखते मर गई महिला, 1997 में रिनपास में भर्ती कराने के बाद नहीं ली सुध
रांची से अजय दयाल की रिपोर्ट
Ranchi News: मां ने बेटे के उस वादे को सच मान लिया था, जो कभी सच था ही नहीं. उसने अपना सामान समेटा, कपड़े ठीक किए और आंखें दरवाजे पर टिकाए बैठी रही. दिन ढल गया, फिर रात हो गई, लेकिन बेटा नहीं आया. उसी इंतजार ने एक मां के भीतर ऐसा खालीपन भर दिया, जिससे वह कभी उबर नहीं सकी. करीब 28 वर्षों तक बेटे और पति की राह देखते-देखते आखिरकार रांची के रिनपास में उसकी जिंदगी थम गई.
1997 में रिनपास में भर्ती कराने के बाद नहीं आया पति
यह कहानी केवल मानसिक बीमारी से ग्रस्त उस महिला की नहीं है, बल्कि टूटे भरोसे और रिश्तों की भी है. वर्ष 1997 में झारखंड के हजारीबाग की रहने वाली महिला के पति ने उसे मानसिक रोगी बताकर रांची के रिनपास में भर्ती कराया था. उस समय पति ने इलाज का भरोसा दिलाया था, लेकिन भर्ती कराने के बाद वह कभी लौटकर नहीं आया. धीरे-धीरे समय बीतता गया, रिश्ते पीछे छूटते चले गए और महिला अस्पताल की चारदीवारी के भीतर ही जीवन काटती रही.
वर्षों बाद बेटे से मुलाकात के बाद जगी थी उम्मीद
कई सालों बाद महिला का बेटा अपनी पत्नी के साथ रिनपास पहुंचा. बेटे को देखकर मां बेहद खुश हुई. बातचीत के दौरान महिला पूरी तरह सामान्य दिख रही थी. मां-बेटे के बीच घंटों बातचीत हुई. बेटे ने कुछ जरूरी कागजात पर मां से हस्ताक्षर कराए और रिनपास प्रशासन से कहा कि वह अगले दिन आकर मां को अपने साथ घर ले जाएगा.
बेटे का वादा बना जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद
बेटे का यह वादा मां के लिए नई जिंदगी की तरह था. उसने खुद को आजाद महसूस किया. अगले दिन जाने की खुशी में उसने अपना सारा सामान बांध लिया. सुबह से शाम तक वह बेटे की राह देखती रही. हर आहट पर उसकी नजर दरवाजे की ओर उठ जाती थी. उसे भरोसा था कि बेटा जरूर आएगा. लेकिन वह दिन ढल गया और बेटा नहीं आया.
इंतजार ने तोड़ दी मानसिक स्थिति
जिस दिन बेटा नहीं आया, उसी दिन से महिला सदमे में चली गई. बेटे के वादे के टूटने ने उसकी मानसिक स्थिति को पूरी तरह झकझोर दिया. इसके बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी. वह फिर से गहरे अवसाद में चली गई. अस्पताल के कर्मचारियों के अनुसार, उस दिन के बाद महिला अक्सर दरवाजे की ओर देखती रहती थी, मानो अब भी किसी का इंतजार कर रही हो.
रिनपास में ही थम गई जिंदगी
लंबे समय तक इलाज के बावजूद महिला की हालत में सुधार नहीं हो सका. आखिरकार रिनपास में ही उसकी मौत हो गई. महिला की मौत के बाद जब रिनपास प्रशासन ने परिजनों को सूचना दी, तो उन्होंने शव लेने से साफ इनकार कर दिया. परिजनों का कहना था कि उनका महिला से अब कोई संबंध नहीं है.
डालसा ने दिखाई मानवीय संवेदना
परिजनों द्वारा शव लेने से इनकार किए जाने के बाद मामले की जानकारी झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण यानी डालसा को दी गई. न्यायालय के निर्देश पर डालसा सचिव राकेश रोशन और पीएलवी भारती शाहदेव ने मामले में हस्तक्षेप किया. दोनों ने लगातार दो दिनों तक परिजनों की काउंसलिंग की.
काउंसलिंग के बाद पहुंचे रिश्तेदार
डालसा की लगातार कोशिशों के बाद मृतका के चचेरे भाई काउंसलिंग के लिए तैयार हुए और रांची पहुंचे. उन्होंने शव को रिसीव किया. इसके बाद हरमू मुक्तिधाम में महिला का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ कराया गया. अंतिम संस्कार के दौरान डालसा की टीम और रिनपास प्रशासन भी मौजूद रहा.
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एक मां, एक पत्नी और टूटे रिश्तों की कहानी
यह घटना केवल एक मानसिक रोगी महिला की मौत की कहानी नहीं है. यह उस मां और पत्नी की कहानी है, जिसे अपनों ने समय रहते संभाला नहीं. 28 साल तक रिनपास की चारदीवारी में बंद जिंदगी, बेटे और पति की राह देखते हुए खत्म हो गई. यह कहानी समाज के लिए एक सवाल छोड़ जाती है कि इलाज के साथ-साथ रिश्तों की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है.
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