केंद्रीय बजट से नालंदा के हस्तकरघा उद्योग को नई उम्मीद:बावनबूटी साड़ी की परंपरा को फिर से जिंदा करने की कवायद, ब्रांडिंग से खुलेंगे नए रास्ते
केंद्रीय बजट में खादी और हस्तकरघा उद्योग के लिए घोषित महात्मा गांधी ग्राम स्वराज पहल ने नालंदा जिले के दम तोड़ते हस्तकरघा उद्योग में नई जान फूंकने की उम्मीद जगाई है। इस पहल के तहत गांव स्तर पर खादी उत्पादन, प्रशिक्षण, कौशल विकास और गुणवत्ता सुधार पर जोर दिया जाएगा। बुनकरों में लौटी आशा की किरण अंबेर (श्रीशतल) निवासी अनुभवी बुनकर नवीन कुमार का कहना है कि एक समय था जब नालंदा के हस्तकरघा उद्योग की धूम देश-विदेश में थी। हुनरमंद हाथों से तैयार बावनबूटी साड़ी की मांग सात समुंदर पार तक होती थी। शहर के दर्जनभर मोहल्लों और गांवों में खटकल की आवाज गूंजती रहती थी। लूम पर तसर, सिल्क, खादी और सूती कपड़ों की बुनाई होती थी। सरकारी सहयोग की कमी और आधुनिक फैशन की मार ने इस परंपरागत उद्योग को लगभग खत्म कर दिया। हाथ से तैयार कपड़ों की मांग घटने लगी तो बुनकर अपना पुश्तैनी पेशा छोड़कर दूसरे धंधों में लग गए। सिमटता गया कारोबार आंकड़े बताते हैं कि साल 2000 तक जिले में सात हजार से अधिक बुनकर इस कारोबार से जुड़े थे, जो अब घटकर मात्र एक हजार रह गए हैं। वर्तमान में शहर से सटे बसवन बिगहा, अलीनगर और कुछ मोहल्लों में ही लूम पर काम करने वाले बुनकर बचे हैं। उनकी शिकायत है कि कपड़े तो तैयार होते हैं, लेकिन बिकते नहीं। कभी-कभार जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर के मेलों में बुलावा मिलता है। बुनकरों का मानना है कि हस्तकरघा उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए सरकारी घोषणाओं को जमीनी स्तर पर लागू करना होगा। बदलते बाजार और फैशन ट्रेंड के अनुसार उत्पाद तैयार करने के लिए बुनकरों को आधुनिक प्रशिक्षण देना जरूरी है। बावनबूटी साड़ी की अनूठी कला बावनबूटी साड़ी नालंदा की पहचान रही है। तसर एवं कॉटन के सादे कपड़े पर हाथों से बुनकर धागे की महीन बूटी डाली जाती है। खास बात यह है कि एक ही बूटी का इस्तेमाल 52 बार किया जाता है, इसलिए इसे बावनबूटी कहा जाता है। इस कला में महारत हासिल करने वाले बसवनबिगहा निवासी बुनकर कपिलदेव प्रसाद को साल 2023 में राष्ट्रपति की ओर से पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया था। ब्रांडिंग से खुलेंगे नए रास्ते बजट में ब्रांडिंग के जरिए खादी को गांव से वैश्विक बाजार तक पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। स्थानीय कारोबारियों को उम्मीद है कि अगर योजना सही तरीके से लागू हुई तो गुम हो चुकी खटकल की आवाज फिर से गली-मोहल्लों में गूंजेगी और हजारों हाथों को रोजगार मिलेगा। नालंदा की प्रसिद्ध बावनबूटी साड़ी की मांग एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ सकती है। हस्तकरघा उद्योग को मिलने वाली यह संजीवनी न केवल परंपरागत कला को बचाएगी, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का साधन भी बनेगी। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार की यह पहल जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी साबित होती है।
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