NEET छात्रा रेप केस-सरकार ने CBI को क्यों सौंपी जांच:SIT 10 पॉइंट पर फेल, परिवार संतुष्ट नहीं; विधानसभा में जवाब से बचने का निकाला रास्ता
NEET छात्रा रेप-मौत केस में आखिरकार जांच सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (CBI) को सौंपी जा रही है। 22 दिन में SIT किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। 18 लोगों के DNA सैंपल फेल हो गए, एम्स की राय अब तक आई नहीं है। इधर, परिवार पुलिस पर दबाव बनाने का आरोप लगा रहा है। अब बड़ा सवाल यह है कि CBI की एंट्री क्यों करवाई जा रही है। क्या SIT किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है। या परिवार एसआईटी की जांच से संतुष्ट नहीं है, या विधानसभा में जवाबदेही से बचने के लिए रास्ता निकाला गया है। इन सवालों के जवाब जानने के लिए भास्कर ने लीगल एक्सपर्ट हाई कोर्ट के वकीलों से राय ली… ये जाना कि SIT की जांच में कहां कमी रह गई? परिवार क्या सवाल उठा रहा है? और CBI के लिए मामला कितना चुनौतीपूर्ण होगा। पढ़िए रिपोर्ट…? अब 10 पॉइंट में समझिए CBI को जांच क्यों सौंपी गई…? 1. सरकार की सबसे बड़ी चुनौती 2 फरवरी से शुरू होनेवाला विधानसभा सत्र बिहार में 2 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा सत्र से ठीक पहले NEET छात्रा रेप-मौत केस की जांच CBI को सौंपने के फैसले को सियासी टाइमिंग से जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार पर लगातार बढ़ते सवाल, SIT की नाकामी और DNA रिपोर्ट के बाद विपक्ष हमलावर है। ऐसे में सरकार के सामने सदन में हर दिन जवाब देने की मजबूरी बन रही थी। CBI जांच की सिफारिश कर सरकार ने यह संकेत दिया कि अब मामला राज्य पुलिस के हाथ में नहीं रहा। इससे विधानसभा के भीतर सीधे जवाबदेही से बचने का रास्ता खुल गया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव लगातार सरकार को घेर रहे हें। उन्होंने लिखा, “बिहार का प्रशासनिक ढांचा भ्रष्ट और अयोग्य है, जो एक रेप-मर्डर केस भी नहीं सुलझा पा रहा।' यही सब सवाल विधानसभा में उठने वाले हैं, इसलिए सीबीआई का रास्ता निकाल लिया गया। 2. SIT 22 दिन में किसी रिजल्ट पर नहीं पहुंची किसी भी संगीन अपराध में शुरुआती दो से तीन दिन ही निर्णय वाले होते हैं। यहां 22 दिन बीतने के बाद भी SIT यह तय नहीं कर पाई कि अपराध कब, कहां और किसने किया। केस थ्योरी बार-बार बदल रही है, पहले सुसाइड, फिर संदिग्ध मौत, फिर रेप। इससे पता चल रहा है कि जांच दिशाहीन चल रही है। DNA मिलान जांच का सबसे प्रमुख हथियार था अब वो भी फेल हो रहा है। 18 सैंपल लिए गए, जिनमें हॉस्टल मालिक, उसके बेटे, हॉस्टल से जुड़े लोग, मददगार, परिजन, लेकिन सभी के सैंपल फेल हो गए। इससे दो बातें निकलती हैं: या तो सही संदिग्धों तक पहुंच नहीं हुई, या सैंपलिंग/सीन-मैनेजमेंट में खामी रही। 3. एम्स की राय अभी तक आई ही नहीं, केस पहले ही ट्रांसफर अभी तक पूरी एसआईटी विशेषज्ञ राय (AIIMS) की रिपोर्ट का इंतजार रही थी। हर सवाल पर एक ही जवाब था, रिपोर्ट का इंतजार करिए। प्राइवेट पार्ट में चोट, कैथेटर थ्योरी, दवाओं का असर, मृत्यु का कारण सभी वहीं से स्पष्ट होना था। SIT अब तक सभी आवश्यक दस्तावेज एकसाथ एम्स को नहीं दे पाई। बिना विशेषज्ञ ओपिनियन के केस डायरी अधूरी है। अब बिना रिपोर्ट का इंतजार किए CBI को जांच सौंप दी गई। 4. सीन ऑफ क्राइम को देर से सील करना, सबूत कमजोर हुए FIR में देरी और हॉस्टल कमरे का समय पर सील न होना। CCTV, DVR का फॉरेंसिक ऑडिट देर से होना, ये सब शुरुआती दौर में ही चूक हुई, इससे सबूत मिट गए। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में प्राइवेट पार्ट में ताजा चोटें, शरीर पर रगड़ के निशान के बावजूद शुरुआती दिनों में सुसाइड पर ही जोर रहा। परिवार का आरोप है कि सुसाइड मानने का दबाव बनाया गया, बार-बार पूछताछ हुई और सुरक्षा नहीं मिली। 5. सीसीटीवी पूरी तरह स्पष्ट नहीं, देर से पहुंची पुलिस 5 जनवरी रात 9:30 से 6 जनवरी दोपहर 2 बजे तक सबसे संदिग्ध समय रहा। यही वो टाइम था, जब छात्रा अपने घर से हॉस्टल पहुंची और पिता से फोन पर बात की। लेकिन इन 17 घंटों का सीसीटीवी पुलिस शायद नहीं जुटा पाई है। या स्पष्ट नहीं है, जिससे यह नहीं पता चल पा रहा कि छात्रा के कमरे का दरवाजा किसने तोड़ा और कब तोड़ा। कमरे में कौन गया और कौन बाहर निकला। 6. सियासत शुरू, लोगों का भरोसा पुलिस से उठता जा रहा लीगल एक्सपर्ट कहते हैं, न्याय केवल होना नहीं चाहिए, होता दिखना भी चाहिए। नीट छात्रा के मामले में पुलिस शुरू से ही ढीला रवैया अपनाती रही। पुलिस की प्राइमरी थ्योरी पर ही एसआईटी आगे बढ़ती रही। यही कारण है कि सियासत तेजी से शुरू हो गई। धरना-प्रदर्शन हुए और अब जिम्मेदारी से बचने के लिए मामला सीबीआई को सौंप दिया गया है। अब जानिए SIT की सबसे कमजोर थ्योरी 1. आत्महत्या थ्योरी पर शुरु से ही लगी रही SIT की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने शुरुआत से ही केस को आत्महत्या के फ्रेम में देखना शुरू कर दिया। जबकि अस्पताल के शुरुआती संकेत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दर्ज संघर्ष के निशान और बाद में FSL रिपोर्ट इस थ्योरी से मेल नहीं खाते थे। आत्महत्या मान लेने से जांच की दिशा सीमित हो गई और कई अहम साक्ष्य उसी नजरिए से इकट्ठा किए गए। कानून कहता है कि जब तक सभी संभावनाएं खारिज न हों, किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए। यहां उल्टा होता दिखाई दिया। निष्कर्ष पहले, जांच बाद में होती रही। 2. DNA को ही निर्णायक मान लेना SIT ने DNA मिलान को लगभग “फाइनल टेस्ट” मान चल रही थी। 18 सैंपल फेल होने के बाद जांच ठहर सी गई। क्योंकि एसआईटी को लग रहा था कि DNA एक मजबूत साक्ष्य है, इसमें किसी न किसी का सैंपल मैच कर जाएगा और उसी पर मामला खोल दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे यह भी पता चल रहा है कि एसआईटी सही संदिग्धों तक पहुंच ही नहीं हुई। 3. अस्पताल से मिले सबूतों को देर से जोड़ना इलाज के दौरान अस्पताल स्टाफ को यौन हिंसा के संकेत मिले थे। लेकिन SIT ने इन्हें शुरुआती थ्योरी का हिस्सा नहीं बनाया। मेडिकल इनपुट को जांच में देर से शामिल किया गया, जिससे साक्ष्य कमजोर होते गए। इसके बाद पुलिस ने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस कर दी कि रेप हुआ ही नहीं। बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारे मामले को उलट दिया। अगर अस्पताल से मिले संकेत से ही पुलिस एक्टिव होती तो केस की दिशा कुछ और ही होती। 4. हाॅस्टल के बजाए, परिवार पर लगातार शक परिवार का आरोप है कि SIT ने बाहरी संदिग्धों की बजाय परिवार और रिश्तेदारों पर ज्यादा फोकस किया। DNA, बार-बार पूछताछ और दबाव की शिकायतों ने जांच की दिशा पर सवाल उठाए। कानून के मुताबिक पीड़ित पक्ष को सहयोगी माना जाता है, न कि प्राथमिक संदिग्ध। इस असंतुलन ने SIT की थ्योरी को कमजोर हो गई। अब जानिए इस पूरे मामले में CBI के सामने क्या चुनौतियां होंगी 1. समय बीतने से साक्ष्य कमजोर होते जा रहे CBI को सबसे बड़ी चुनौती समय की देरी से मिलेगी। घटना को कई हफ्ते बीत चुके हैं। डिजिटल डेटा ओवरराइट हो सकता है, गवाहों के बयानों में अंतर आ सकता है, फिजिकल साक्ष्य की ताजगी कम हो चुकी है। CBI को अब रीकंस्ट्रक्शन के आधार पर केस बनाना होगा, जो हमेशा मुश्किल होता है। 2. एसआईटी की जांच की कमियों को दूर करना CBI को SIT की शुरुआती गलतियों के बावजूद केस को दोबारा खड़ा करना होगा। सीन ऑफ क्राइम, सैंपलिंग और टाइमलाइन की खामियों को बचाव पक्ष कोर्ट में हथियार बनाएगा। CBI को यह दिखाना होगा कि नई जांच कैसे निष्पक्ष और वैज्ञानिक है, ताकि पुरानी थ्योरी केस को न डुबो दें। 3. परिवार-गवाहों का भरोसा जीतना परिवार और कुछ गवाह पहले ही दबाव और डर की बात कह चुके हैं। CBI के लिए जरूरी होगा कि वह गवाहों की सुरक्षा और परिवार का विश्वास बहाल करे। बिना भरोसे के कोई भी गवाह खुलकर बयान नहीं देगा। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, सिर्फ कानूनी नहीं। 4. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एम्स रिपोर्ट का कंपरीजन CBI को पोस्टमॉर्टम, FSL और एम्स ओपिनियन सबको साइंटिफिक तरीके से जोड़ना होगा। मेडिकल राय में जरा-सी गड़बड़ी बचाव पक्ष को संदेह का लाभ दे सकती है। यह सबसे तकनीकी और संवेदनशील चुनौती होगी। CCTV, कॉल डिटेल, टावर डंप और मोबाइल डेटा इन सबका टाइम-सिंक जरूरी है। अगर एक भी डेटा सेट मेल नहीं खाया, तो पूरी डिजिटल थ्योरी कमजोर पड़ जाएगी। संदिग्धों का कराना चाहिए था लाई डिटेक्टर टेस्ट- हाईकोर्ट एडवोकेट पटना हाईकोर्ट की एडवोकेट मीनू कुमारी के अनुसार, SIT सही तरीके से जांच नहीं कर पाई है। हॉस्टल की बिल्डिंग को सील करना चाहिए था। ताकि सबूतों से छेड़छाड़ की कोई संभावना न बने। हॉस्टल में लगे CCTV के DVR की जांच FSL से करवानी चाहिए थी। इससे पता चलता कि कहीं सबूतों को मिटाने की कोशिश तो नहीं हुई। संदिग्धों का लाई डिटेक्टर टेस्ट कराना चाहिए था। जहां तक बात CBI की है तो वो एक प्रोफेशनल जांच एजेंसी है। केस की डेफ्थ में जाकर वो जांच करेगी तो रिजल्ट मिल सकता है।
प्रभात मेमारियल की रिपोर्ट को सही मानना पुलिस की गलती- हाईकोर्ट एडवोकेट पटना हाई कोर्ट के एडवोकेट माधव राज के अनुसार, /प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल की रिपोर्ट को सही मानकर पटना पुलिस ने जो कहा था कि लड़की के साथ किसी प्रकार का सेक्सुअल असॉल्ट नहीं हुआ है। यही पटना पुलिस की सबसे बड़ी गलती रही। जबकि, PMCH के पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में वॉयलेंस और सेक्सुअल असॉल्ट की संभावना जताई गई। इससे पब्लिक में गलत मैसेज गया। परिवार शुरू से प्रभात मेमोरियल की रिपोर्ट को गलत बता रहा था। फिर भी पुलिस रिपोर्ट को सही मानती रही। एसआईटी ने क्या जांच की, इसकी ऑफिशियल डिटेल नहीं आई। पीड़ित परिवर और पब्लिक को एसआईटी की जांच पर भरोसा नहीं हो रहा था।' ‘सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ही केस की जांच CBI को देने की अनुशंसा की है। जो एक इंडिपेंडेंट एजेंसी है। इसके जांच करने के तरीके थोड़े अलग होंगे। ये एजेंसी साइंटिफिक तरीके से जांच करती है। गहराई से जांच कर घटना को अंजाम देने वाले तक पहुंचना ही इस सेंट्रल एजेंसी की प्राथमिकता होगी। पब्लिक को भरोसा है कि CBI अपराधी को पकड़ लेगी।’
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